Tuesday, December 6, 2022
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आंखों की रोशनी कम होने के कारण । aankho ki roshni kam hone ke karan

aankho ki roshni kam hone ke karan:- धूम्रपान ड्राई और विभिन्न तरह की विजन से संबंधित बीमारियों से जुड़ा हुआ है, जिसमें मैकुलर डिजनरेशन, मोतियाबिंद, यूवाइटिस और डायबिटिक रेटिनोपैथी शामिल हैं।

जेनेटिक, आयु, और पर्यावरण सहित कई ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से आंखों की रोशनी कम होने लगती है। पर क्‍या आप जानते हैं कि आपकी डिजिटल दुनिया भी आपकी आंखों की दुश्‍मन हो सकती है। 

युवाओं में बढ़ती कमजोर रोशनी की वजह उनके लैपटॉप और स्‍मार्टफोन की रोशनी है। आज की डिजिटल दुनिया में आंखों की कमजोरी की समस्या ज्यादा देखी जा रही है, 

जो हमारे विजन को प्रभावित करती है। इसके अलावा और बहुत सी छोटी-छोटी आदतें हैं जो नजर कमजोर कर रहीं हैं। 

आइए जानते हैं वे कारण जो कमजोर कर रहे हैं आपकी आंखों की रोशनी। 

 

aankho ki roshni kam hone ke karan

aankho ki roshni kam hone ke karan

# प्रदूषण 

ये दुनिया कितनी तेज गति से बदल रही है। जहां सड़को पर गाडियां दौड़ रही है तो वहीं हवा में हवाई जहाज उड़ रहे हैं। एक तरफ जहां हम उत्पादन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हर जगह हम कूड़ा भी इकट्ठा कर रहे है। 

ये सभी हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है और पर्यावरण के नुकसान से हमारी हेल्थ भी खराब होती है। खासकर हमारी आंखों पर इसका साफ तौर पर असर दिखाई दे रहा है। 

हमारी आंखें बेहद ही संवेदनशील होती हैं। प्रदूषक, विषाक्त पदार्थ, और मौसम जैसी चीजें हमारी आंखों को प्रभावित करती हैं।

 

# आंख का रगड़ना

क्या आप अपनी आंखों को बहुत ज्यादा रगड़ते हैं, तो संभल जाइए। इससे आपकी आंखें कमजोर और रोशनी कम हो सकती है। इससे आपको एलर्जी कंजक्टिवाइटिस और आंखों के संक्रमण के जोखिम के अलावा आपको केराटोकोनस भी हो सकता है।

 

# धूम्रपान करना

नजर कमजोर होने के कारणों में एक कारण यह है कि आप ज्यादा से ज्यादा धूम्रपान करते हैं। धूम्रपान की लत आपको अंधा भी बना सकती है। 

धूम्रपान करने से इसका असर आंखों पर और शरीर के अन्य कई अंगों पर भी पड़ता है। धूम्रपान ड्राई और विभिन्न तरह की विजन से संबंधित बीमारियों से जुड़ा हुआ है, 

जिसमें मैकुलर डिजनरेशन, मोतियाबिंद, यूवाइटिस और डायबिटिक रेटिनोपैथी शामिल हैं। जो लोग धूम्रपान नहीं करते हैं उनकी तुलना में धूम्रपान करने वालों की अंधे होने की संभावना चार गुना अधिक हो जाती है।

 

# कम पानी पीना

आंखों की रोशनी कम होने के कारण में एक कारण यह है कि आप पानी का जितना जरूरी है उतना सेवन नहीं कर रहे हैं। निर्जलीकरण या डिहाइड्रेशन की वजह से आपकी आंखों में पर्याप्त आंसू पैदा नहीं हो पाते हैं, जो पोषण और नमी के लिए आवश्यक हैं। डिहाइड्रेशन भी आपकी आंखों को शुष्क, लाल और पफ्फी बनने का कारण बनता है।

# पौष्टिक खाद्य पदार्थ का सेवन न करना

हरी पत्तेदार सब्जियों में ल्यूटिन और ज़ीएक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मैकुलर डिजनरेशन और मोतियाबिंद के जोखिम को कम करते हैं। 

बीटा कैरोटिन, विटामिन सी, और विटामिन ई से भरपूर पीले और नारंगी रंग के फल और सब्जियां आपकी स्वस्थ दृष्टि या आंख के लिए आवश्यक हैं। 

आंखों के लिए अन्य आहार में आप अंडा, नट्स, फैटी फिश, और अन्य समुद्री आहार ले सकते हैं। इन आहारों को लेने से धुंधलेपन, आंखों में जलन और रैशेज जैसी समस्याएं भी दूर होती है।

 

# भरपूर नींद न लेना

नींद की कमी से आंखों पर तनाव और थकान जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इसके लिए आप रोजाना 6-8 घंटे की पर्याप्त नींद लीजिए। एक्सपर्ट के मुताबिक अगर आपकी आंख भी रात में सोते समय बेमतलब ही कई बार खुलती है तो आप कटस्ट्रोफिसिंग या नाइट ड्रेड नामक बीमारी के शि‍कार हो सकते हैं।

 

# लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन  की स्क्रीन

अपने लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन के सामने बहुत अधिक समय बिताना भी आंखों की रोशनी को कम कर सकता है। आपको बता दें कि आंखों की लुब्रिकेशन और सफाई के लिए आंखों का झपकना बहुत ही जरूरी होता है। लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन के स्क्रीन के ज्यादा उपयोग से आंख के झपकने की क्षमता बहुत ही कम हो जाती है।

इस अलावा ब्लिंकिंग या आंख झपकना रेटिना को उत्तेजित करता है और आपके दिमाग को आराम देता है। स्क्रीन-आधारित उपकरणों का ज्यादा उपयोग सिरदर्द, जलती हुई आंखें, धुंधली दृष्टि, और नींद में परेशानी जैसे कई समस्याओं को जन्म देता है

 

# आंखों की रौशनी धीरे-धीरे कम होने के हो सकते हैं ये भी कारण, इन बातों को जानना है बेहद जरूरी

बदलते दौर की भागादौड़ी वाली जिंदगी में वर्क लोड इतना बढ़ गया है कि ना चाहते हुए भी आपको कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल हर समय करना पड़ता है. छोटे-बड़े हर काम के लिए आप मोबाइल पर निर्भर रहते हैं. 

परिवार से ज़्यादा वक़्त लोग अपने मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर को देते हैं, जिसका नतीजा होती है कमज़ोर आंखें. अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी बड़े-बड़े चश्मे लगाये दिखते हैं. 

आंखों की समस्या बड़ी उम्र से लेकर छोटी उम्र तक सबको है. लेकिन नेत्रहीनता के कुछ अन्य कारण जैसे काला मोतिया या ग्लूकोमा भी हैं, जिससे आंखों में कालापानी की समस्या से भी जाना जाता है. 

आंखों में दबाव बढ़ने से ऑप्टिक नस पर दबाव पड़ता है और यह सूखने लगती है जिससे कि धीरे-धीरे आंखों की रौशनी कम होने लगती है और दिखना बंद हो जाता है. इसे विज्ञान की भाषा में ‘ऑप्टिक एट्रॉफी’ के नाम से भी जाना जाता है. इसके मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं.

 

# प्राइमरी की परेशानी

एक्यूट ग्लूकोमा होने पर सिर में अधिक दर्द, लालिमा, उल्टी, धुंधलापन और दिखाई न देने जैसी समस्या होती हैं.

 

क्रोनिक सिंपल ग्लूकोमा

इसमें अधिकतर मरीजों को पता ही नहीं चलता कि वह इस समस्या से पीड़ित हैं. इसमें मरीज को कोई दर्द या किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती. कुछ मामले में बार-बार चश्मे का नंबर बदलना भी इसका लक्षण माना जाता है.

कॉन्जिनाइटल  ग्लूकोमा

ये रोग का तीसरा प्रकार है जो कि अधिकतर बच्चों को अपना शिकार बनाता है. यह समस्या 10 हजार बच्चों में से किसी एक में पाई जाती है. बच्चों में इसकी वजह आनुवांशिक होती है जिस वजह से उनकी आंखों से पानी, लालिमा, आंखों का आका बड़ा होना और कॉर्निया का धुंधला होना जैसी समस्या होती है.

 

# सेकेंडरी में समस्या

किसी प्रकार की चोट लगने और मोतियाबिंद पककर फूटने से भी मरीज सेकेंडरी ग्लूकोमा से प्रभावित हो सकता है.

 

# मुख्य लक्षण

यह रोग व्यक्ति की दोनों आंखों को प्रभावित कर सकता है. सामान्य रूप से मरीज में दिखने का घेरा कम होने जैसी समस्या हो सकती है. उसके बाद धीरे-धीरे उसकी दृष्टि का विस्तार कम होने लगता है और फिर मरीज को एक ट्यूब में देखने जैसा प्रतीत होता है. अंत में उसकी आंखों की रौशनी बिलकुल चली जाती है.

 

# इन्हें रहता है ज्यादा खतरा

माता-पिता को यदि यह समस्या है तो उनके बच्चों को भी आनुवांशिक रूप से यह रोग होने की संभावना रहती है. इसके अलावा डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, मायोपिया (दूर का साफ़ न देख पाना), हाइपरमेट्रोपिया और 40 से अधिक उम्र के लोगों को ग्लूकोमा का खतरा बना रहता है. इसकी पहचान इंट्रा ऑक्यूलर प्रेशर से की जा सकती है.

 

# जांच व उपचार

प्रमुख जांचें

ग्लूकोमा की पहचान के लिए इंट्रा ऑक्यूलर प्रेशर, आंख के परदे की जांच, पेरीमेट्री व अन्य जांचें की जाती हैं.

 

इलाज

इसका इलाज इस बात पर निर्भर होता है कि आप किस स्थिति और स्टेज में हैं. कॉन्जिनाइटल ग्लूकोमा का इलाज केवल सर्जरी से ही संभव है. इसके अलावा बड़े व्यक्तियों में एक्यूट ग्लुकोमा के दौरान नसों में होने वाली रुकावट को दूर करने के लिए टेब्रीक्यूलोप्लास्टी, लेजर सर्जरी या टेब्रीकुलेक्टॉमी ऑपरेशन किया जाता है. क्रोनिक ग्लूकोमा का इलाज टेब्रीक्यूलोप्लास्टी ऑपरेशन से किया जाता है। 

 

मुझे उम्मीद है यह जानकारी aankho ki roshni kam hone ke karan आपके लिए उपयोगी होगी। आपने हमे इतना समय दिया आपका धन्यवाद। आपसे अनुरोध है की इस जानकरी को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

 

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