Friday, December 9, 2022
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ozone parat kya hai: ओजोन परत का महत्व, निर्माण और ओजोन परत के क्षरण के करण

ozone parat kya hai ओजोन परत का महत्व:- ओजोन परत मानव समुदाय एवं इस सृष्टि के लिए एक जीवन रक्षक परत है यह ओजोन गैस से बनी परत है। ओजोन गैस सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों का अवशोषण कर लेती है जिस कारण ये हानिकारक किरणे भूतल तक नहीं पहुँचा पातीं। ओजोन परत को पृथ्वी का रक्षा कवच अथवा पृथ्वी का छाता भी कहा जाता है।

लेकिन आज के समय में ओजोन परत में कमी के करण को पर्यावरण समस्याओं का सर्जन माना जाता है अर्थात पर्यावरण में उत्पन्न होने वाले अनेक समस्याओं का निर्माण ओजोन परत में कमी के  करण का परिणाम है।  

Ozone parat kya hai

आप सभी को तो पता है कि ओजोन परत एक रक्षा प्रणाली के तौर पर कार्य करता हैं जो हमें सूर्य की पराबैगनी किरणे जो हमें हानि पहुंचाती हैं उनसे हमारी रक्षा करता हैं लेकिन यह बनती कैसे है तो चलिए जानते हैं कि ओजोन परत का निर्माण कैसे होता है। ओजोन परत क्या है?

ozone parat kya hai

ओजोन परत ओजोन गैस से बनी एक मोटी लेयर होती है जो ऑक्सीजन के 3 अणु  मिलकर ओजोन गैस का निर्माण करते हैं इसका रासायनिक सूत्र O3  होता है यह गैस हल्के नीले रंग की होती है तथा इसकी गंध तीखी होती है। ओजोन एक प्रबल ऑक्सीकरण कारक गैस होती है जो अत्यधिक सांद्रण होने पर धमाके के साथ विघटित हो जाती है। 

ओजोन गैस के सांद्रण की ऊंचाई के विषय में पर्याप्त मतअंतर है ऐसा माना जाता है कि ओजोन वायुमंडल की हर ऊंचाई पर किसी ना किसी मात्रा में अवश्य पाई जाती है लेकिन इसका वायुमंडल में सर्वाधिक सांद्रण 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के मध्य पाया जाता है तथा इस परत में भी ओजोन का अधिकतम सांद्रण 12 से 35 किलोमीटर की ऊंचाई के मध्य पाया जाता है। 

12 से 35 किलोमीटर के बीच स्थित इस परत को ओजोन मंडल या ओजोन परत कहा जाता है ओजोन की परत समताप मंडल में स्थित है। समताप मंडल की ओजोन परत पराबैगनी सौर विकिरण के लगभग 99% भाग का अवशोषण करती है ओजोन का अधिकांश निर्माण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के ऊपर होता है यहां से वायु मंडली संचार द्वारा कुल ओजोन का ध्रुवी क्षेत्रों के ऊपर स्थित वायुमंडल की निचली परतो में परिवहन हो जाता है। 

 

ओजोन छिद्र क्या है?

वायुमंडल में समताप मंडल के अंतर्गत ओजोन परत का वह क्षेत्र जो ओजोन रहित है वही क्षेत्र कहलाता है ओजोन छिद्र। यह छिद्र ओजोन परत के नस्ट होने  का परिणाम है। ओजोन परत के खराब होने के संबंध में जानकारी प्राप्त करने का सर्व प्रथम प्रयास तत्कालिक सोवियत संघ द्वारा वर्ष 1967 मैं छोड़े गए उपग्रहों द्वारा किया गया। खोज से पता चला कि अगस्त 1987 तथा अक्टूबर 1987 के बीच ओजोन के औसत सांद्रण में 50 परसेंट तथा कुछ क्षेत्रों में सौ परसेंट की कमी आई है। 

 

ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले कारक क्या किया है?

ओजोन परत के स्थायीकरण के कारण निम्नलिखित हैं

  1. ओजोन ओजोन परत का नुकसान मुख्यतः हेलो जनित गैसों द्वारा होता है इनमें से मुख्य गैस हैं क्लोरोफ्लोरोकार्बन हेलो ंश तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रमुख है ओजोन परत का सर्वाधिक नुकसान क्लोरोफ्लोरोकार्बन में वृद्धि के कारण होता है

  2. क्लोरोफ्लोरोकार्बन स्थिर अभिक्रिया योगिक है यह वायुमंडल के निचले हिस्से में पाए जाते हैं जहां वे 100 वर्षों तक आ परिवर्तित रह सकते हैं अधिक ऊंचाई पर वह पराबैगनी किरणों द्वारा विखंडित होते हैं तथा अति क्रियाशील क्लोरीन परमाणु को अवशोषित करते हैं जिससे ओजोन को हानि पहुंचती है

  3. धुर्वीय समताप मंडल पर बादल कम तापमंडल पर क्लोरीन को स्वतंत्र करने के लिए सतह प्रदान करते जिससे ओजोन को नुकसान पहुंचने की क्रिया बहुत तीव्र होती है सूर्य की रोशनी इसमें तथा अंटार्कटिका में वसंत की शुरुआत में बर्फ जमने के समय क्लोरीन ओजोन अणुों पर आक्रमण करती है परिणाम स्वरूप अंटार्कटिका में ओजोन का खत्म होना प्रारंभ हो जाता है

  4. अंटार्कटिका में भी बसंत ऋतु के समय ओजोन का विकटन होता है अंटार्कटिका समताप मंडल बसंत में जल्दी करने तथा ठंडा होता है तथा सूर्य की रोशनी में कांति प्रति व्यक्ति का समय कम हो जाता है जो कि ओजोन छाई करण के लिए अनुकूल परिस्थिति है

  5. समताप मंडल में पराबैंगनी विकिरण ओजोन का प्रकाश विच्छेदन करते हैं अर्थात O3 को O2  एवं O मैं तोड़ देती है जो शीघ्र ही फिर से जुड़ कर O3 बना देता है इस प्रक्रिया में ओजोन का क्षरण होता है

 

ओजोन परत के क्षरण के करण या ओजोन परत के नुकसान के क्या परिणाम होंगे?

ओजोन भारत की सांद्रता कम होने से पराबैंगनी विकिरण अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुंचते हैं यह मानव स्वास्थ्य जानवरों पौधों सूक्ष्मजीव अन्य पदार्थों तथा वायु गुणवत्ता के लिए हानिकारक होती है जैसे 

  1. जलवायु पर प्रभाव ओजोन अल्पता के कारण वायुमंडल में सूर्य की पराबैंगनी विकिरण का न्यूनतम अवशोषण होता है जिसके कारण अधिक से अधिक मात्रा में पर भेजने विकिरण धरातल पर पहुंचती है जिस कारण बोतल का तापमान बढ़ जाता है तथा वायुमंडल को प्रभावित करता है तापमान में वृद्धि के कारण हमारे ग्लेशियर एवं ग्रीनलैंड तथा अंटार्कटिका की बर्फ तेजी से पानी में बदल रही है जिस कारण सागर तल में वृद्धि होती जा रही है तथा निचले सागर तटीय क्षेत्र धीरे धीरे जलमग्न होने की कगार पर पहुंच गए हैं

  2. मानव समुदाय पर प्रभाव ओजोन परत के अल्पता तथा छह के कारण बोतल पर तापमान में वृद्धि के कारण गोरी त्वचा वालों लोगों में त्वचा कैंसर का रोग बढ़ता जाएगा एक अध्ययन के अनुसार ओजोन परत में 12% प्रतिवर्ष छह होने पर अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रतिवर्ष 130000 लोग त्वचा कैंसर के शिकार हो जाएंगे मानव शरीर पर हो जाने के कारण अधिक मात्रा में पराबैगनी किरणों के प्रभाव देखने को मिलेंगे जिससे इसका दुष्प्रभाव पड़ने से मानव शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आएगी

  3. जिव समुदाय पर प्रभाव भूतल पर प्राप्त होने वाले सूर्य की पराबैंगनी विकिरण में वृद्धि का वनस्पति एवं जंतु समुदायों पर कई रूपों में प्रभाव पड़ेगा यह माना जाता है कि पराबैगनी सूर्य के विकिरण में वृद्धि के कारण तापमान में संभावित व्यक्ति के फल स्वरुप प्रकाश संश्लेषण जल उपयोग क्षमता तथा पौधों की उत्पादकता तथा उत्पादन में भारी कमी हो जाएगी तापमान में वृद्धि के कारण सागरी पारिस्थितिक तंत्र में फाइटोप्लैक् टर्न द्वारा प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में भारी कमी हो जाएगी भूमंडलीय गर्माहट के कारण महासागरीय जल के तापमान में वृद्धि होने से प्रवाल का रंग सफेद हो जाता है 

  4. पारिस्थितिक प्रभाव ओजोन की अल्पता तथा छह के कारण विश्वव्यापी विकिरण तथा ऊष्मा संतुलन में परिवर्तन होने से जीव मंडल के जैविक समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से पारिस्थितिक संतुलन में अव्यवस्था हो सकती है तापमान में वृद्धि के कारण जलवायु में स्थानीय स्तर प्रदेशिक स्तर तथा विश्व स्तर पर परिवर्तन हो सकता है इन जलवायु परिवर्तन में जंतुओं भास्कर मनुष्य की शारीरिक विशेषताओं में परिवर्तन होगा तथा पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता में कमी होगी धरातल की सतह तथा निचले भाई मंडल की ताबीर दशाओं में परिवर्तन होने से वनस्पतियों के प्रकार घनत्व तथा उनकी स्थिति पर प्रभाव पड़ेगा

 

ओजोन परत की रक्षा के लिए क्या कार्य किए गए हैं?

ओजोन परत की अल्पता तथा उसके चाय होने से समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष प्रयास किए जा रहे हैं जिन्हें हम निम्नलिखित रुप में देख सकते हैं

  1. वियना संधि वियना संधि ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता है इस पर वर्ष 1985 के वियना सम्मेलन में सहमति बनी और वर्ष 1988 मैं इसे लागू किया गया 196 देशों के साथ साथ यूरोपीय संघ द्वारा इसे मंजूर किया जा चुका है वियना संधि ओजोन परत की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के लिए एक ढांचे के रूप में कार्य करती है

  2. मॉन्ट्रियल संधि ओजोन परत में हो रहे क्षरण को रोकने के लिए वर्ष 1987 में 24 देशों के प्रतिनिधियों ने माल्ट रियल में बैठक आयोजित की ओजोन परत के क्षरण के कारकों पर मार्टियल संधि को इतिहास में सबसे सफल अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संधि के रूप में माना जाता है वर्तमान में 197 तेज मार्टियल संधि से जुड़े हुए हैं इसके अंतर्गत ओजोन की परत परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों के उपयोग को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए समय सारणी तैयार की गई है

  3. की गाली समझौता की काली समझौता 2016 वर्ष 1987 में संपन्न हुआ मैट्रियल प्रोटोकॉल का अगला चरण है इस समझौते में क्लाइमेट पर असर डालने वाले हाइड्रो फ्लोरो कार्बन का इस्तेमाल करने के मुद्दों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता किया गया इस समझौते की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं

  • इस समझौते के अनुसार विकसित देश तथा यूरोपीय यूनियन वर्ष 2019 की शुरुआत में एचएफसी में 10 परसेंट की कटौती करेंगे

  • वर्ष 2014 से चीन लैटिन अमेरिका और कई दूसरे देश इसे लागू करेंगे

  • वर्ष 2028 से भारत पाकिस्तान ईरान इराक और खाड़ी देश एचएफसी में कटौती करेंगे

  • इस समझौते के तहत वर्ष 2045 तक एचएफसी के इस्तेमाल में पचासी परसेंट की कमी करने की उम्मीद है यह समझौता 1 जनवरी 2019 से लागू हो चुका है

 

ओजोन परत को लेकर भारत की स्थिति क्या है?

भारत वियना समझौते में 18 मार्च 1991 को तथा मार्टियल समझौते में 19 जून 1992 को शामिल हुआ रैना और मार्टियल समझौते का हिस्सा बनने के बाद से भारत ओजोन परत के संरक्षण से जुड़ी वैश्विक चिंताओं में भागीदारी निभाते हुए ओजोन परत को हानि पहुंचाने वाले पदार्थों की कटौती में अहम भूमिका निभा रहा है

 

वर्ष 1993 से समझौते से जुड़े सभी पक्षों उद्योगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के सक्रिय सहयोग के जरिए भारत में जनवरी 2010 के बाद से सीएफसी सीटीसी और हेलो ंश गैसों का उत्पादन और इस्तेमाल तकरीबन खत्म कर दिया गया है वर्ष 2016 में संपन्न हुए की काली समझौते पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए

 

यह धरती हमें एक विरासत के तौर पर मिली है जिससे हमें आने वाली पीढ़ी को भी देना है हमें ऐसे रास्ते अपनाने चाहिए जिससे ना केवल हमारा फायदा हो बल्कि उसे हमारी आने वाली पीढ़ी भी एक बेहद खूबसूरत धरती का आनंद ले सके

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