Sunday, September 25, 2022
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कबीर के दोहे | kabir das ke dohe

kabir das ke dohe कबीर दास हिंदी भाषा के भक्ति काल में निर्गुण धारा के कवि थे। कबीर शब्द का अर्थ इस्लाम के अनुसार महान होता है। कबीर अपने दोहे के कारण हिंदी के इतिहास में  प्रसिद्द हैं।  

kabir ji ke dohe सरलता के लिए जाने जाते है। कबीर हमेशा जीवन के कर्म में विश्वास करते थे वह कभी भी अल्लाह और राम के बीच भेद नहीं करते थे।  

उन्होंने हमेशा अपने उपदेश में इस बात का जिक्र किया कि ये दोनों एक ही भगवान के दो अलग नाम है।  उन्होंने लोगों को जाती – पाती या  किसी भी धर्म को नकारते हुए भाईचारे के एक धर्म को मानने के लिए प्रेरित किया।sant kabir dohe अपने अंदर अथाह अर्थ समाया हुआ है।  

ज्यादातर कबीर के दोहे उनके द्वारा सांसारिक व्यावहारिकता को दर्शता हैं।  यदि उनके दोहों को जीवन में आत्मसार कर लिया जाये तो मनुष्य कभी भी सांसारिक मोहमाया के कारण दुखी नहीं हो सकेगा।   

इस पोस्ट में आपको संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे  पढ़ने को मिलेंगें  (  Kabir Dohe in Hindi, , Kabir Dohe करता था सो क्यों किया का अर्थ, जो आपको जिंदगी जीने का एक नया रास्ता दिखाते हैं।

kabir das ke dohe

साई इतना दीजिये, जामें कुटुंब समाय।

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।।

अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि हे परमात्मा मुझे बस इतना दीजिये जिससे कि मेरे परिवार का भरण पोषण हो सके। जिससे मैं अपना भी पेट भर सकूं और मेरे द्वार पर आया हुआ कोई भी साधु-संत कभी भूखा न जाये।

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

अर्थ: कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने अपने ज्ञान से ही हमें भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए।

जब मैं था, तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि।

सब अँधियारा मिटि गया, दीपक देख्या माहि।।

अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे अंदर “मैं” अर्थात अहंकार का भाव था तब तक परमात्मा मुझसे दूर थे, अब जब मेरे अंदर से “मैं” अर्थात अहंकार हो गया है तो परमात्मा मुझे मिल गए हैं। जब मैंने ज्ञान रूपी दीपक के उजाले में अपने अंदर देखा तो मेरे अंदर व्याप्त अहंकार रूपी अँधेरे का नाश हो गया। कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।

शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यह जो शरीर है वो विष जहर से भरा हुआ है और गुरु अमृत की खान हैं। अगर अपना शीशसर देने के बदले में आपको कोई सच्चा गुरु मिले तो ये सौदा भी बहुत सस्ता है।

सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज ।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।

अर्थ: अगर मैं इस पूरी धरती के बराबर बड़ा कागज बनाऊं और दुनियां के सभी वृक्षों की कलम बना लूँ और सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूँ तो भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये ।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।

आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।।

अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि आप यदि ठगे जाते हैं तो कोई बात नहीं। लेकिन आप किसी को ठगने का प्रयास मत कीजिये। यदि आप ठगे जाते हैं तो आपको सुख का अनुभव होता है क्योंकि आपने कोई अपराध नहीं किया है। लेकिन यदि आप किसी और को ठगते हैं तो आप अपराध करते हैं जिससे आपको दुःख ही होता है।

बड़ा भया सो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर ।

पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि खजूर का पेड़ बेशक बहुत बड़ा होता है लेकिन ना तो वो किसी को छाया देता है और फल भी बहुत दूरऊँचाई  पे लगता है। इसी तरह अगर आप किसी का भला नहीं कर पा रहे तो ऐसे बड़े होने से भी कोई फायदा नहीं है।

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें ।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि निंदकहमेशा दूसरों की बुराइयां करने वाले लोगों को हमेशा अपने पास रखना चाहिए, क्यूंकि ऐसे लोग अगर आपके पास रहेंगे तो आपकी बुराइयाँ आपको बताते रहेंगे और आप आसानी से अपनी गलतियां सुधार सकते हैं। इसीलिए कबीर जी ने कहा है कि निंदक लोग इंसान का स्वभाव शीतल बना देते हैं।

दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।

बिना जीव के श्वास से, लोह भस्म हो जाये।।

अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि कभी भी किसी दुर्बल व्यक्ति को मत सताइये। क्योंकि दुर्बल की बददुआ में बहुत शक्ति होती है जो किसी को भी नष्ट करने की ताकत रखती है। ठीक उसी प्रकार जैसे निर्जीव खाल से लोहे को भी भस्म किया जा सकता है।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।

जो मन खोजा आपनो , मुझसन  बुरा न कोय ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा रहा लेकिन जब मैंने खुद अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है। मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा हूँ भावार्थात हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते हैं लेकिन अगर आप खुद के अंदर झाँक कर देखें तो पाएंगे कि हमसे बुरा कोई इंसान नहीं है।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।

जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।

अर्थ: दुःख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख में सब ईश्वर को भूल जाते हैं। अगर सुख में भी ईश्वर को याद करो तो दुःख कभी आएगा ही नहीं।

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।

अर्थ: जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिटटी को रौंद रहा था, तो मिटटी कुम्हार से कहती है – तू मुझे रौंद रहा है, एक दिन ऐसा आएगा जब तू इसी मिटटी में विलीन हो जायेगा और मैं तुझे रौंदूंगी।

कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हम इस संसार में सबका भला सोचें। किसी से यदि हमारी दोस्ती न हो तो किसी से दुश्मनी भी न हो।

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात ।

देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान की इच्छाएं एक पानी के बुलबुले के समान हैं जो पल भर में बनती हैं और पल भर में खत्म। जिस दिन आपको सच्चे गुरु के दर्शन होंगे उस दिन ये सब मोह माया और सारा अंधकार छिप जायेगा।

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये ।

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ।

अर्थ: चलती चक्की को देखकर कबीर दास जी के आँसू निकल आते हैं और वो कहते हैं कि चक्की के  पाटों के बीच में कुछ साबुत नहीं बचता।

पाहन पूजें हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार।

याते यह चाकी भली, पीस खाये संसार।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि अगर पत्थर पूजने से परमात्मा की प्राप्ति होती तो मैं पहाड़ की पूजा करूँ। इससे अच्छी तो यह चक्की है जिसका पीसा हुआ आटा समस्त संसार खाता है।

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार ।

फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ।

अर्थ:मालिन को आते देखकर बगीचे की कलियाँ आपस में बातें करती हैं कि आज मालिन ने फूलों को तोड़ लिया और कल हमारी बारी आ जाएगी। भावार्थात आज आप जवान हैं कल आप भी बूढ़े हो जायेंगे और एक दिन मिटटी में मिल जाओगे। आज की कली, कल फूल बनेगी।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हमारे पास समय बहुत कम है, जो काम कल करना है वो आज करो, और जो आज करना है वो अभी करो, क्यूंकि पलभर में प्रलय जो जाएगी फिर आप अपने काम कब करेंगे।

प्रेम प्याला जो पिए, शीश दक्षिणा दे।

लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का ले।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि प्रेम का प्याला वही पी सकता है जो अपने सर का बलिदान करने के लिए तैयार हो। एक लालची इंसान चाहे कितना भी प्रेम-प्रेम जप ले वह कभी भी अपने सर का बलिदान नहीं दे सकता।

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग ।

तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सको तो ढूढ लो।

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप ।

जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जहाँ दया है वहीँ धर्म है और जहाँ लोभ है वहां पाप है, और जहाँ क्रोध है वहां सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ ईश्वर का वास होता है।

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि पुस्तकों को पढ़ पढ़कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु को प्राप्त हो गए लेकिन कोई पूर्ण ज्ञानी नहीं बन पाया है। कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ले अर्थात प्रेम को समझ जाये तो वही सच्चा पंडित या ज्ञानी कहलाने योग्य है।

जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान ।

जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण ।

अर्थ: जिस इंसान अंदर दूसरों के प्रति प्रेम की भावना नहीं है वो इंसान पशु के समान है।

 

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति से कभी भी उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए। वरन उसे कितना ज्ञान है यह देखना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जैसे मूल्य तलवार का होता है म्यान का नहीं।

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप।

जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जहाँ दया होती है वहां धर्म होता है। जहाँ लालच और क्रोध होता है वहां पाप होता है। जहाँ क्षमा होती है वहां ईश्वर का वास होता है।

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय।

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जिन बुरे कार्यों को तू करता था वह तूने क्यों किये। अब करने के बाद पछताने से क्या लाभ होगा। यदि बबूल का पेड़ बोया है तो पेड़ पर बबूल के ही फल लगेंगे, उसमे आम के फल नहीं लग सकते। कबीर दास जी समझा रहे हैं कि इंसान जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा ही फल मिलेगा।

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।

जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय।।

अर्थ: जीवन के अंत समय आने पर जब परमात्मा ने बुलावा भेजा तो कबीर रो पड़े और सोचने लगे की जो सुख साधु संतों के सत्संग में है वह बैकुंठ में नहीं है। कबीर दास जी कहते हैं कि सज्जनों के सत्संग के सम्मुख वैकुण्ठ का सुख भी फीका है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय.

अर्थ : कबीर दास जी कहते हैं कि इस दुनियाँ में जो भी करना चाहते हो वो धीरे-धीरे होता हैं अर्थात कर्म के बाद फल क्षणों में नहीं मिलता जैसे एक माली किसी पौधे को जब तक सो घड़े पानी नहीं देता तब तक ऋतू में फल नही आता। 

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।

पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥

अर्थ: कबीरदास जी ने कहा है की हे प्राणी, चारो तरफ ईश्वर के नाम की लूट मची है, अगर लेना चाहते हो तो ले लो, जब समय निकल जाएगा तब तू पछताएगा । अर्थात जब तेरे प्राण निकल जाएंगे तो भगवान का नाम कैसे जप पाएगा ।

दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर ।

अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि तुम ध्यान से देखो कि नदी का पानी पीने से कम नहीं होता और दान देने से धन नहीं घटता ।

 

हमने इस पोस्ट में कबीर के दोहे ( Kabir Ke Dohe ) में से कुछ बहतरीन दोहों को लिखा है। हमें उम्मीद है आपको kabir ke dohe पढ़कर कुछ शिक्षा जरूर मिली होगी। हमने आपके लिए तुलसी दास जी के दोहे पर भी एक लेख लिखा है आप उसे भी बढ़कर आनंद उठा सकते है |

इसी तरह की ज्ञानवर्धक जानकारी आगे भी पाने के लिए हमारे साथ बने रहें। और दूसरों को लाभ पहुँचने में अपना सहयोग दे इस पोस्ट को ज्यादा से ज्याद लोगों से शेयर करें। 

आपने हमे इतना समय दिया आपका बहुत धन्यवाद। 

संघर्ष के प्रेरणादायक शब्द

 Thought of the day in hindi

good morning quotes in hindi | गुड मॉर्निंग कोट्स

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