Monday, September 26, 2022
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तुलसीदास के दोहे | tulsidas ke dohe

Tulsidas ke dohe – तुलसीदास जी भारतीय और विश्व साहित्य में सबसे महान कवियों में गिने जाते थे। मुख्य रुप से उन्हें भक्ति काल के रामभक्ति शाखा के महान कवि के रूप में जाना जाता है। वह भगवान राम की भक्ति के लिए मशहूर थे। श्रीरामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के महान कवि थे | तुलसीदास जी के दोहे ज्ञान-सागर के समान हैं |

वहीं अगर आप भी अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं और सफलता हासिल करना चाहते हैं तो आप भी तुलसीदास जी के बेहद उम्दा ज्ञानवर्धक और जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले दोहे को पढ़कर सफलता हासिल कर सकते हैं।तो चलिए जानते हैं तुलसीदास जी के दोहे, चौपाई – Tulsidas Ke Dohe के बारे में।

तुलसी दास जी के दोहे समाज को एक नई दिशा प्रदान करते है। इनका अनुसरण आपको एक अच्छे इंसान के गुण प्रदान करते है। तो आइये जानते है तुलसी दास जी के प्रशिद्ध दोहे के बारे में।

# मुद मंगलमय संत समाजू।जो जग जंगम तीरथ राजू।

राम भक्ति जहॅ सुरसरि धारा।सरसई ब्रह्म विचार प्रचारा|

अनुवाद – संत समाज आनन्द और कल्याणप्रद है।वह चलता फिरता तीर्थराज है।वह ईश्वर भक्ति का प्रचारक है।

# सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग

लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।

अनुवाद – जो ब्यक्ति प्रसन्नता से संतो के विशय में सुनते समझते हैं और उस पर मनन करते हैं-वे इसी शरीर एवं जन्म में धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों फल प्राप्त करते हैं।

# तुलसी इस संसार में, भांति-भांति के लोग।

सबसे हस-मिल बोलिए, नदी-नाव संजोग।।

 

# जड़ चेतन गुन दोषमय, विश्व कीन्ह करतार।

संत हंस गुन गहहीं पथ, परिहरी बारी निकारी।।

 

# तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।

अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए।।

 

# चित्रकूट के घाट पर भई संतान की भीर।

तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर।।

 

# तुलसी अपने राम को, भजन करौ निरसंक।

आदि अंत निरबाहिवो, जैसे नौ को अंक।।

# तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहु ओर।

बसीकरण एक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर।।

 

# तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या, विनय, विवेक।

साहस सुकृति सुसत्याव्रत, रामभरोसे एक।।

 

# नाम राम को अंक है, सब साधन है सून।

अंक गए कछु हाथ नही, अंक रहे दस गून।।

 

# दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण।।

 

# तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।

तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।

# बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर-नारि।

सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।

 

# तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

 

# साधु चरित सुभ चरित कपासू।निरस विशद गुनमय फल जासू।

जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।वंदनीय जेहि जग जस पावा।

tulsidas ke dohe in hindi with meaning – तुलसी दास जी के दोहे और उनका हिंदी अनुवाद

# मति कीरति गति भूति भलाई।जब जेहि जतन जहाॅ जेहि पाई।

सो जानव सतसंग प्रभाउ।लोकहुॅ बेद न आन उपाउ।

अनुवाद – जिसने भी जहाॅ बुद्धि यश सदगति सुख सम्पदा प्राप्त किया है-वह संतों की संगति का प्रभाव जानें। सम्पूर्ण बेद और लोक में इनकी प्राप्ति का यही उपाय बताया गया हैं।

 

# बिनु सतसंग विवेक न होई।राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

सत संगत मुद मंगल मूला।सोई फल सिधि सब साधन फूला ।

अनुवाद – संत की संगति बिना विवेक नही होता।प्रभु कृपा के बिना संत की संगति सहज नही है।संत की संगति आनन्द और कल्याण का मूल है।इसका मिलना हीं फल है।अन्य सभी उपाय केवल फूलमात्र है।

 

# सठ सुधरहिं सत संगति पाई।पारस परस कुघात सुहाई।

बिधि बश सुजन कुसंगत परहीं।फनि मनि सम निज गुन अनुसरहिं।

अनुवाद – दुश्ट भी सतसंग से सुधर जाते हैं।पारस के छूने से लोहा भी स्वर्ण हो जाताहै।यदि कभी सज्जन ब्यक्ति कुसंगति में पर जाते हैं तब भी वे साॅप के मणि के समान अपना प्रकाश नहीं त्यागते और विश नही ग्रहण करते हैं।

 

# बिधि हरि हर कवि कोविद वाणी।कहत साधु महिमा सकुचानी।

सो मो सनि कहि जात न कैसे।साक बनिक मनि गुन गन जैसे।

अनुवाद – ब्रह्मा विश्णु शिव कवि ज्ञानी भी संत की महिमा कहने में संकोच करते हैं।साग सब्जी के ब्यापारी मणि के गुण को जिस तरह नही कह सकते-उसी तरह हम भी इनका वर्णन नही कर सकते।

 

# बंदउ संत समान चित हित अनहित नहि कोई

अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।

अनुवाद – संत का चरित्र समतामूलक होता है।वह सबका हित ओर किसी का भी अहितनही देखता हैं।हाथों में रखा फूल जिस प्रकार सबों को सुगंधित करता है-उसीतरह संत भी शत्रु ओर मित्र दोनों की भलाई करते हैं।

 

# संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।

बाल बिनय सुनि करि कृपा राम चरण रति देहु।

अनुवाद – संत सरल हृदय का और सम्पूर्ण संसार का कल्याण चाहते हैं।

अतः मेरी प्रार्थना है कि मेरे बाल हृदय में राम के चरणों में मुझे प्रेम दें।

 

# उपजहिं एक संग जग माही।जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं

सुधा सुरा सम साधु असाधूं।जनक एक जग जलधि अगाधू।

अनुवाद – कमल और जोंक दोनों साथ हीं जल में पैदा होते हैं पर उनके गुण अलग हैं।अमृत और मदिरा दोनों समुद्र मंथन से एक साथ प्राप्त हुआ।इसी तरह साधू और दुश्ट दोनों जगत में साथ पैदा होते हैं परन्तु उनके स्वभाव अलग होते हैं।

 

# खल अघ अगुन साधु गुन गाहा।उभय अपार उदधि अवगाहा।

तेहि तें कछु गुन देाश बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने। 

अनुवाद – शैतान के अवगुण एवं साधु के गुण दोनों हीं अपरम्पार और अथाह समुद्र हैं।विना पहचान एवं ज्ञान के उनका त्याग या ग्रहण नही किया जा सकता है।

 

# जड चेतन गुण दोशमय विस्व किन्ह अवतार

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि वारि विकार।

अनुवाद – भगवान ने हीं जड चेतन संसार को गुण दोशमय बनाया है लेकिन संत रूप में हंस दूशित जल छोड कर दूध हीं स्वीकार करता है।

 

# लखि सुवेश जग वंचक जेउ।वेश प्रताप पूजिअहिं तेउ।

उघरहिं अंत न होई निवाहू।कालनेमि जिमि रावन राहूं।

अनुवाद – कभी कभी ठग भी साधु का भेश बनाकर लोग उन्हें पूजने लगते हैं पर एक दिन उनका छल प्रकट हो जाता है जैसे कालनेमि रावण और राहु का हाल हुआ।

# कियहुॅ कुवेशु साधु सनमानु।जिमि जग जामवंत हनुमानू।

हानि कुसंग सुसंगति लाहू।लोकहुॅ वेद विदित सब काहू।

अनुवाद – बुरा भेश बनाने पर भी साधु का सम्मान हीं होता है।संसार में जामवंत और हनुमान जी का अत्यधिक सम्मान हुआ। बुरी संगति से हानि और अच्छी संगति से लाभ होता है इसे पूरा संसार जानता है।

# गगन चढई रज पवन प्रसंगा।कीचहिं मिलई नीच जल संगा।

साधु असाधु सदन सुक सारी।सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं।

अनुवाद – हवा के साथ धूल आकाश पर चढता है।नीचे जल के साथ कीचर में मिल जाता है।साधु के घर सुग्गा राम राम बोलता है और नीच के घर गिन गिन कर गालियाॅ देता है।संगति से हीं गुण होता है।

# धूम कुसंगति कारिख होई।लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।

सोई जल अनल अनिल संघाता।होई जलद जग जीवन दाता।

अनुवाद – बुरे संगति में धुआँ  कालिख हो जाता है।अच्छे संगति में धुआॅ स्याही बन वेद  पुराण लिखने में काम देता है।

वही धुआँ पानी आग और हवा के संग बादल बनकर संसार को जीवन देने वाला  वर्षा  बन जाता है।

# नयनन्हि संत दरस नहि देखा।लोचन मोरपंख कर लेखा।

ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला।

अनुवाद – जिसने अपने आॅखों से संतों का दर्शन नही किया उनके आॅख मोरपंख पर दिखाई देने वाली नकली आँख के समान हैं। उनके सिर कडवे तुम्बी के सदृश्य हैं जो भगवान और गुरू के चरणों पर नही झुकते हैं।

# अग्य अकोविद अंध अभागी।काई विशय मुकुर मन लागी।

लंपट कपटी कुटिल विसेशी।सपनेहुॅ संत सभा नहिं देखी।

अनुवाद – अज्ञानी मूर्ख अंधा और अभागा लोगों के मन पर विशय रूपी काई जमी रहती है।लंपट ब्यभिचारी ठग और कुटिल लोगों को स्वप्न में भी संत समाज का दर्शन नहीं हो पाता है।

#  सट विकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा

अमित बोध अनीह मितभोगी।सत्यसार कवि कोविद जोगी।

  

#  निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। परगुन सुनत अधिक हरखाहिं।

सम सीतल नहिं त्यागहि नीती।सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती।

अनुवाद – संत अपनी प्रशंसा सुनकर संकोच करते हैं और दूसरों की प्रशंसा सुनकर खूब खुश होते हैं।वे सर्वदा शांत रहकर कभी भी न्याय का त्याग नहीं करते तथा उनका स्वभाव सरल तथा सबसे प्रेम करने बाला होता है।

# जप तप ब्रत दम संजत नेमा।गुरू गोविंद विप्र पद प्रेमा।

श्रद्धा छमा मयत्री दाया।मुदित मम पद प्रीति अमाया।

अनुवाद – संत जप तपस्या ब्रत दम संयम और नियम में लीन रहते हैं।गुरू भगवान और ब्राह्मण के चरणों में प्रेम रखते हैं।उनमें श्रद्धा क्षमाशीलता मित्रता दया प्रसन्नता और ईश्वर के चरणों में विना छल कपट के प्रेम रहता है।

# बिरति बिबेक बिनय बिग्याना।बोध जथारथ बेद पुराना।

दंभ मान मद करहिं न काउ।भूलि न देहिं कुमारग पाउ।

अनुवाद – उन्हें वैराग्य बिबेक बिनय परमात्मा का ज्ञान वेद पुराण का ज्ञान रहता है।वे अहंकार घमंड अभिमान कभी नहीं करते और भूलकर भी कभी गलत रास्ते पर पैर नहीं रखते हैं।

# संत संग अपवर्ग कर कामी भव कर पंथ

कहहिं संत कवि कोविद श्रुति पुरान सदग्रंथ।

अनुवाद – संत की संगति मोक्ष और कामी ब्यक्ति का संग जन्म मृत्यु के बंधन में डालने बाला रास्ता है।संत कवि पंण्डित एवं बेद पुराण सभी ग्रंथ ऐसा वर्णन करते हैं।

# संतत के लच्छन सुनु भ्राता।अगनित श्रुति पुरान विख्याता।

अनुवाद – हे भाई-संतों के गुण अनगिनत हैं जो बेदों और पुाणों में प्रसिद्य हैं।

# संत असंतन्हि कै अस करनी।जिमि कुठार चंदन आचरनी।

काटइ परसु मलय सुनु भाई।निज गुण देइ सुगंध बसाई।

अनुवाद – संत और असंतों के क्रियाकलाप ऐसे हैं जैसे कुल्हाड़ी और चंदन के आचरण होते हैं।कुल्हाड़ी चन्दन को काटता है लेकिन चन्दन उसे अपना गुण देकर सुगंध से सुगंधित कर देता है।

# ताते सुर सीसन्ह चट़त जग वल्लभ श्रीखंड

अनल दाहि पीटत घनहि परसु बदन यह दंड।

अनुवाद – इसी कारण चन्दन संसार में प्रभु के मस्तक पर चट़ता है और संसार की प्रिय वस्तु है लेकिन कुल्हाड़ी को यह सजा मिलती है कि पहले उसे आग में जलाया जाता है एवं बाद में उसे भारी घन से पीटा जाता है।

# विशय अलंपट सील गुनाकर।पर दुख दुख सुख सुख पर।

सम अभूत रिपु बिमद बिरागी।लोभा मरस हरस भय त्यागी।

अनुवाद – संत सांसारिक चीजों मे लिप्त नहीं होकर शील और सदगुणों के खान होते हैं। उन्हें दुसरों के दुख देखकर दुख और सुख देखकर सुख होता है।वे हमेशा समत्व भाव में रहते हैं।उनके मन में किसी के लिये शत्रुता नहीं रहती है।वे हमेशा घमंड रहित वैराग्य में लीन एवं लोभ क्रोध खुशी एवं डर से विलग रहते हैं।

# कोमल चित दीनन्ह पर दाया।मन बच क्रम मम भगति अमाया।

सबहिं मानप्रद आपु अमानी।भरत प्रान सम मम ते प्रानी।

अनुवाद – संत का हृदय कोमल एवं गरीबों पर दयावान होता है एवं मन वचन और कर्म से वे ईश्वर में निश्कपट भक्ति रखते हैं। वे सबकी इज्जत करते हैं पर स्वयं इज्जत से इच्छारहित होते हैं।वे प्रभु को प्राणों से भी प्रिय होते हैं।

# बिगत काम मम नाम परायण।सांति विरति विनती मुदितायन।

सीतलता सरलता मयत्री।द्विज पद प्रीति धर्म जनपत्री।

अनुवाद – उन्हें कोई इच्छा नहीं रहती।वे केवल प्रभु के नाम का मनन करते हैं। वे शान्ति वैराग्य विनयशीलता और प्रसन्नता के भंडार होते हैं। उनमें शीतलता सरलता सबके लिये मित्रता ब्राह्मनों के चरणों में प्रेम और धर्मभाव रहता है।

# निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज

ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुंज।

अनुवाद – जिनके लिये निंदा और बड़ाई समान हो और जो ईश्वर के चरणों में ममत्व रखता हो वे अनेक गुणों के भंडार और सुख की राशि प्रभु को प्राणों के समान प्रिय हैं।

# संत सहहिं दुख पर हित लागी।पर दुख हेतु असंत अभागी।

भूर्ज तरू सम संत कृपाला।पर हित निति सह विपति विसाला।

अनुवाद – संत दूसरों की भलाई के लिये दुख सहते हैं एवं अभागे असंत दूसरों को दुखदेने के लिये होते हैं। संत भोज बृक्ष के समान कृपालु एवं दूसरों की भलाई के लिये अनेक कश्ट सहने के लिये भी तैयार रहते हैं।

# संत उदय संतत सुखकारी।बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।

परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा।पर निंदा सम अघ न गरीसा।

अनुवाद – संतों का आना सर्वदा सुख देने बाला होता है ,जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय संसार को सुख देता है। बेदों मे अहिंसा को परम धर्म माना गया है और दूसरों की निंदा के जैसा कोई भारी पाप नहीं है।

# संत बिटप सरिता गिरि धरनी, पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।

अनुवाद – संत बृक्ष नदी पहाड़ एवं धरती-इन तमाम की क्रियायें दूसरों की भलाई के लिये होती है।

# संत हृदय नवनीत समाना।कहा कविन्ह परि कहै न जाना।

निज परिताप द्रवई नवनीता।पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।

अनुवाद – संत का दिल मक्खन के जैसा होता है।लेकिन कवियों ने ठीक नहीं कहा है। मक्खन तो ताप से स्वयं को पिघलाता है किंतु संत तो दूसरों के दुख से पिघल जाते हैं।

 

# राम नाम  मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार |

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ||

अर्थ अनुवाद: तुलसीदासजी कहते हैं कि हे मनुष्य ,यदि तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार की जीभरुपी देहलीज़ पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो |

 

# नामु राम  को कलपतरु कलि कल्यान निवासु |

जो सिमरत  भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास ||

अर्थ अनुवाद: राम का नाम कल्पतरु (मनचाहा पदार्थ देनेवाला )और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर ) है,जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया |

 

# तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर |

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ||

अर्थ अनुवाद: गोस्वामीजी कहते हैं कि सुंदर वेष देखकर न केवल मूर्ख अपितु चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं |सुंदर मोर को ही देख लो उसका वचन तो अमृत के समान है लेकिन आहार साँप का है |

 

# सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु |

बिद्यमान  रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ||

अर्थ अनुवाद: शूरवीर तो युद्ध में शूरवीरता का कार्य करते हैं ,कहकर अपने को नहीं जनाते |शत्रु को युद्ध में उपस्थित पा कर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं |

 

# सहज सुहृद  गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि |

सो  पछिताइ  अघाइ उर  अवसि होइ हित  हानि ||

अर्थ अनुवाद: स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है |

# मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक |

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ||

अर्थ अनुवाद: तुलसीदास जी कहते हैं कि मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है |

 

# सचिव  बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस |

राज  धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ||

अर्थ अनुवाद:  गोस्वामीजी कहते हैं कि मंत्री, वैद्य और गुरु —ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर ) प्रिय बोलते हैं तो (क्रमशः ) राज्य,शरीर एवं धर्म – इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है |

 

# तुलसी मीठे बचन  ते सुख उपजत चहुँ ओर |

बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ||

अर्थ अनुवाद: तुलसीदासजी कहते हैं कि मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं |किसी को भी    वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे |

 

# सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि |

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि ||

अर्थ अनुवाद: जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं |दरअसल ,उनका तो दर्शन भी उचित नहीं होता |

 

# दया धर्म का मूल  है पाप मूल अभिमान |

तुलसी दया न छांड़िए ,जब लग घट में प्राण ||

अर्थ अनुवाद: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है|

# तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान|

भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण||

अर्थ अनुवाद: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, समय बड़ा बलवान होता है, वो समय ही है जो व्यक्ति को छोटा या बड़ा बनाता है| जैसे एक बार जब महान धनुर्धर अर्जुन का समय ख़राब हुआ तो वह भीलों के हमले से गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए

# तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए|

अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए||

अर्थ अनुवाद: तुलसीदास जी कहते हैं, ईश्वर पर भरोसा करिए और बिना किसी भय के चैन की नींद सोइए| कोई अनहोनी नहीं होने वाली और यदि कुछ अनिष्ट होना ही है तो वो हो के रहेगा इसलिए व्यर्थ की चिंता छोड़ अपना काम करिए।

 

मुझे उम्मीद है आपको tulsidas ke dohe in hindi with meaning  पढ़कर अच्छा लगा होगा और कुछ नया जानने समझने को मिला होगा। आपके लिए हमने कबीर दास के दोहे पर भी लेख लिखा है। आप कबीर के दोहे का भी आनंद उठा सकते है। संत कबीर के दोहे आम जन मानुष के बीच बहुत प्रशिद्ध है।

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