Monday, August 8, 2022
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जानन्ति मुनि द्वारा ब्राह्मण वेदमालि के उद्धार की कथा | Vedamali ka Uddhar

Vedamali ka Uddhar:- प्राचीन काल की बात है, रैवत  मन्वंतर में वेद माली नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे जो वेदों और वेदांगों  के पारदर्शी विद्वान थे। उनके मन में संपूर्ण प्राणियों के प्रति दया भरी हुई थी वह सदा भगवान की पूजा में लगे रहते थे किंतु, आगे चलकर वह स्त्री पुत्र और मित्रों के लिए धन उपार्जन करने में संलग्न हो गए जो वस्तु नहीं बेचनी चाहिए उसको भी वह बेचने लगे उन्होंने धन लेकर तपस्या और व्रतों का विक्रय किया और तीर्थ यात्रा भी वे दूसरों के लिए ही करते थे।

यह सब उन्होंने अपनी स्त्री को संतुष्ट करने के लिए ही किया इसी तरह कुछ समय बीत जाने पर ब्राह्मण के दो जुड़वा पुत्र हुए यज्ञ माली और सुमाली तदनंतर पिता उन दोनों बालकों का बड़े स्नेह और वात्सल्य से अनेक प्रकार के साधनों द्वारा पालन पोषण करने लगे वेद माली ने अनेक उपायों से यत्न पूर्वक धन एकत्र किया और एक दिन मेरे पास कितना धन है यह जानने के लिए उन्होंने अपने धन को गिनना प्रारंभ किया।

उनका धन संख्या में बहुत अधिक था इस प्रकार धन की स्वयं गणना करके वह हर्ष से फूल उठे साथ ही उस अर्थ की चिंता से उन्हें बड़ा विश्मय  भी हुआ। वे सोचने लगे मैंने नीच पुरुषों से धन लेकर न बेचने योग्य वस्तुओं का विक्रय करके तथा तपस्या आदि को भी बेच कर यह प्रचुर धन पैदा किया है किंतु मेरी अत्यंत दुस्सह तृष्णा अभी शांत नहीं हुई। अहो, मैं तो समझता हूं यह तृष्णा बहुत बड़ा कष्ट है समस्त क्लेशों का कारण भी यही है इसके कारण मनुष्य यदि समस्त कामनाओं को प्राप्त कर ले तो भी उन्हें दूसरी वस्तुओं की अभिलाषा करने लगता है।

जरा अवस्था में आने पर मनुष्य के केस पक जाते हैं, दांत गिर जाते हैं, आंख और कान भी जीण हो जाते हैं किंतु एक तृष्णा ही तरुण सी होती जाती है। मेरी सारी इंद्रियां शिथिल हो रही है बुढ़ापे ने मेरे बल को भी नष्ट कर दिया किंतु तृष्णा तरुणी हो और भी प्रबल होती जा रही है। जिसके मन में कष्ट दायनी तृष्णा विद्यमान है वह विद्वान होने पर भी मूड हो जाता है, परम शांत होने पर भी अत्यंत क्रोधी हो जाता है, और बुद्धिमान होने पर भी अत्यंत मूड बुद्धि हो जाता है आशा मनुष्यों के लिए अजय शत्रु की भांति भयंकर है |

अतः विद्वान पुरुष यदि शाश्वत सुख चाहे तो आशा को त्याग दें बाल हो तेज हो विद्या हो यश हो सम्मान हो नित्य वृद्धि हो रही हो और उत्तम कुल में जन्म लिया हो तो भी यदि मन में आशा तृष्णा बनी हुई है तो वह बड़े वेग से इन सब पर पानी फेर देती है। मैंने बड़े क्लेश से यह धन कमाया है अब मेरा शरीर भी कल गया बुढ़ापे ने मेरे बल को नष्ट कर दिया आता है अब मैं उत्साह पूर्वक परलोक सुधारने का यत्न करूंगा ऐसा निश्चय करके वेद माली धर्म के मार्ग पर चलने लगे उन्होंने उसी क्षण उस सारे धन को चार भागों में बांटा अपने द्वारा पैदा किए उस धन में से 2 भाग तो ब्राह्मण ने स्वयं रख लिए और शेष 2 भाग दोनों पुत्रों को दे दिए।

तदन्तर अपने किए हुए पापों का नाश करने की इच्छा से उन्होंने जगह-जगह पहुंच ले पोखरे बगीचे और बहुत से देव मंदिर बनाए तथा गंगा जी के तट पर अनादि का दान भी किया। इस प्रकार संपूर्ण धन का दान करके भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव से युक्त हो वे तपस्या के लिए नर नारायण के आश्रम बद्री वन गए वहां उन्होंने एक अत्यंत रमणीय आश्रम देखा जहां बहुत से ऋषि मुनि रहते थे फल और फूलों से भरे हुए वृक्ष समूह उस आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे शास्त्र चिंतन में तत्पर भगवत सेवा पारायण तथा पारब्रह्म परमेश्वर की स्तुति में संलग्न अनेक वृद्ध महर्षि आश्रम की श्रीवृद्धि कर रहे थे।

वेद माली ने वहां जाकर जानन्ति नाम वाले एक मुनि का दर्शन किया जो शिष्यों से घिरे बैठे थे और उन्हें परब्रह्म तत्व का उपदेश कर रहे थे वह मुनि महान तेज के पुंज से जान पड़ते थे उनमें सम्म दम्म  सभी गुण विराजमान थे।

राग आदि दोषों का सर्वथा अभाव था वह सूखे पत्ते खाकर रहा करते थे वेद माली ने मुनि को देखकर उन्हें प्रणाम किया मुनि जानन्ति ने  कंदमूल और फल आदि सामग्रियों द्वारा नारायण बुद्धि से अतिथि वेद माली का पूजन किया अतिथि सत्कार हो जाने पर वेद माली ने हाथ जोड़कर विनय से मस्तक झुकाकर वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि से कहा भगवान मैं कृतकृत्य हो गया आज मेरे सब पाप दूर हो गए महा भाग आप विद्वान हैं ज्ञान देकर मेरा उद्धार कीजिए।

ऐसा कहने पर मुनि श्रेष्ठ जानन्ति बोले ब्राह्मण तुम प्रतिदिन सर्वश्रेष्ठ भगवान विष्णु का भजन करो सर्वशक्तिमान श्री नारायण का चिंतन करते रहो दूसरों की निंदा और चुगली कभी ना करो महामते सदा परोपकार में लगे रहो भगवान विष्णु की पूजा में मन लगाओ और मूड पुरुषों से मिलना जुलना छोड़ दो काम क्रोध लोभ मोह मद और मात्सर्य छोड़कर लोगों को अपने आत्मा के समान देखो इससे तुम्हें शांति मिलेगी ईर्ष्या दोष दृष्टि तथा दूसरे की निंदा भूलकर भी ना करो पाखंड पूर्णाचार अहंकार और क्रूरता का सर्वथा त्याग करो सब प्राणियों पर दया तथा साधु पुरुषों की सेवा करते रहो अपने किए हुए धर्मों को पूछने पर भी दूसरों पर प्रकट ना करो दूसरों को अत्याचार करते देखो यदि शक्ति हो तो उन्हें रोको लापरवाही ना करो, अपने कुटुंब का विरोध ना करते हुए सदा अतिथियों का स्वागत सत्कार करो पत्र पुष्प फल दूर्वा अथवा पल्ल्वों द्वारा निष्काम भाव से जगदीश्वर भगवान नारायण की पूजा करो देवताओं ऋषियों तथा पितरों का विधि पूर्वक तर्पण करो विप्र वार विधिपूर्वक अग्नि की सेवा भी करते रहो देव मंदिर में प्रतिदिन झाड़ू लगाया करो और एकाग्र चित्त होकर उसकी लिपाई पुताई भी किया करो देव मंदिर की दीवार में जहां कहीं कुछ टूट फूट गया हो उसकी मरम्मत कराते रहो मंदिर में प्रवेश का जो मार्ग हो उसे पताका और पुष्प आदि से सुशोभित करो तथा भगवान विष्णु के गृह में दीपक जलाया करो।

प्रतिदिन यथाशक्ति पुराण की कथा सुनो उसका पाठ करो और वेदांत का स्वाध्याय करते रहो ऐसा करने पर तुम्हें परम उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा ज्ञान से समस्त पापों का निश्चय ही निवारण एवं मोक्ष हो जाता है।

जन्नति मुनि किस प्रकार उपदेश देने पर परम बुद्धिमान वेद माली उसी प्रकार ज्ञान के साधन में लगे रहे मैं अपने आप में ही परमात्मा भगवान अच्युत का दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुए मैं ही उपाधि रहे थे स्वयं प्रकाश निर्मल भ्रम हूं ऐसा निश्चय करने पर उन्हें परम शांति प्राप्त हुई

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